इन प्रमुख दवाओं के घटे दाम  

मुंबई। भारतीय बायोसिमिलर दवा बाजार में लगातार बढ़ रही प्रतिस्पर्धा से प्रमुख दवाओं के दाम घट रहे हैं। कुछ मामलों में नवप्रवर्तक दवाओं की तुलना में इसमें 70 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है। जैविक दवाओं को रसायनिक दवाओं के विपरीत जीव-जंतुओं या उनके घटकों से तैयार किया जाता है। पेटेंट अवधि खत्म होने के बाद उत्पादित जैविक दवा को ही बायोसिमिलर दवा कहते हैं। पिछले चार साल के दौरान भारत में इस श्रेणी में कम से कम 84 ब्रांड उतारे गए हैं। उद्योग जगत का मानना है कि जैविक दवाओं का बाजार अब परिपक्व होने लगा है और खर्च करने की क्षमता बढऩे से भी इन दवाओं तक रोगियों की पहुंच बढ़ी है। बायोलॉजिक्स उपचार (कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में) कुछ हजार से कुछ लाख के दायरे में हो सकता है। उदाहरण के लिए, बायोकॉन ने 2014 के दौरान भारत में जब अपनी बायोसिमिलर दवा ट्रास्टुजुमैब को उतारा था, उसके बाद से ही इस नवोन्मेषी ब्रांड की कीमत में गिरावट आई है। कंपनी ने स्तन कैंसर के उपचार के लिए यहां हरसेप्टिन को उतारा है। कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि कैनमैब (बायोसिमिलर के लिए बायोकॉन का ब्रांड नाम) के लॉन्च के बाद से ही कई अन्य फार्मास्युटिकल कंपनियों ने ट्रास्टुजुमैब का अपना बायोसिमिलर संस्करण उतारा था। इसने भारत में अपना विस्तार किया और चार साल के दौरान रोगियों की पहुंच में चार गुना वृद्धि दर्ज की गई।
 एआईओसीडी अवैक्स के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में बिकने वाली बायोसिमिलर दवाओं की मूल्य वृद्धि की रफ्तार पिछले साल सुस्त रही। हालांकि 2017 में इससे पिछले वर्ष के मुकाबले बाजार में 24 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन 2018 (एमएटी) में मूल्य वृद्धि की रफ्तार घटकर 1.9 फीसदी रह गई। एमएटी यानी मूविंग एनुअल टर्नओवर यानी पिछले 12 महीने के लिए कुल कारोबार। विश्लेषकों के अनुसार, मुख्य वजह इस श्रेणी में मूल्यह्रास रही। प्रमुख ब्रोकरेज फर्म के विश्लेषक के अनुसार अडालिमुमैब जैसे प्रमुख मॉलिक्यूल के लिए मूल्यह्रास 70 फीसदी से अधिक रहा। अडालिमुमैब का इस्तेमाल रेउमैटॉयड अर्थराइटिस के उपचार में होता है।
 कैडिला हेल्थकेयर के अडालिमुमैब का रीकम्बिनेंट ब्रांउ एग्जेम्पसिया की बिक्री वित्त वर्ष 2018 में 5.24 अरब रुपये की रही। कंपनी 21 बायोसिमिलर दवाओं पर काम कर रही है जिनमें से कुछ को बाजार में उतारा भी जा चुका है। साल 2017 में इसने एक बायोसिमिलर दवा बेवासिजुमैब को उतारा था जो कैंसर की दवा है। बायोकॉन ने भी उसी साल बाजार में उतारा था। इंटास, हेटेरो, ल्यूपिन, एल्केम और एमक्योर जैसी तमाम कंपनियां अब बाजार में ऐसी दवाएं उतार रही हैं। इस श्रेणी का मूल ब्रांड अवास्टिन है जिसे रॉश ने उतारा था और एआईओसीडी के आंकड़ों से पता चलता है कि इस बाजार में कितनी प्रतिस्पर्धा है। साल 2016 में अवास्टिन की बाजार हिस्सेदारी 99.86 फीसदी थी जो अब घटकर महज 6.9 फीसदी रह गई है। अहमदाबाद की कंपनी इंटास फार्मास्युटिकल्स की अब सबसे अधिक बाजार हिस्सेदारी (37 फीसदी) हो गई है जिसके बाद 26.6 फीसदी बाजार हिस्सेदारी के साथ हेटेरो लैबोरेट्रीज का स्थान है। हालांकि इस बाजार का आकार 2016 में 32.9 करोड़ रुपये था जो दोगुना से अधिक वृद्धि के साथ अगस्त 2018 में 83.2 करोड़ रुपये हो गया है।  टॉरंट फार्मा के प्रवक्ता ने कहा कि तकनीकी विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचा जरूरत के कारण इन दवाओं को विकसित करने की लागत काफी अधिक हो जाती है। उन्होंने कहा कि हाल में कई नई कंपनियां इस बाजार में उतरी हैं, खास तौर पर  इन-लाइसेंसिंग साझेदारी के जरिये।

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