नई दिल्ली। अमेरिकी दवा कंपनियां भारत की ओर रुख कर रही हैं। इसके पीदे उनकी चीन से दूरी बनाना माना जा रहा है। कभी फार्मा इंडस्ट्री का साइड रोल निभाने वाली ये कंपनियां अब ग्लोबल इनोवेटर्स की अहम पार्टनर बन चुकी हैं। चीन पर बढ़ती निर्भरता से दूर जाने की रणनीति ने भारतीय कंपनियों को नई ऊर्जा दी है।

यह है मामला

भारत का कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेजी से बदल रहा है। पहले भारतीय ष्टक्रष्ठरूह्र कंपनियों को केवल केमिकल या सपोर्टिव कंपनियों के तौर पर देखा जाता था। अब इन्हें ग्लोबल फार्मा सेक्टर में रणनीतिक साझेदार का दर्जा मिल रहा है। अब ये कंपनियां रिसर्च, मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन में अहम भूमिका निभा रही हैं। जेफरीज के मुताबिक इस सेक्टर का मार्केट कैप 40-50 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। यह निवेशकों की प्राथमिकता में शामिल हो चुका है।

अमेरिकी फार्मा कंपनियां अब चीनी ष्टक्रष्ठरूह्र पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहतीं। भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधाओं के बीच भारतीय कंपनियां मजबूत विकल्प बनकर उभरी हैं। इससे भारतीय कंपनियों को हर साल लगभग 700 मिलियन डॉलर की कमाई हो सकती है।

बेहतर परिस्थितियों में यह आंकड़ा 1.4 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। भारतीय ष्टक्रष्ठरूह्र कंपनियों की पाइपलाइन तेजी से बढ़ रही है। बड़ी फार्मा कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट इनके पास आ रहे हैं। वजन घटाने और डायबिटीज की नई दवाओं के लिए भी भारतीय कंपनियों के पास बड़ा अवसर है। इन दवाओं का इंटरमीडिएट मार्केट 2030 तक 1.2 अरब डॉलर का हो सकता है।