मेडिकल उपकरणों पर फिक्स होगा ट्रेड मार्जिन !

नई दिल्ली। मेडिकल उपकरण के उद्योग को राहत मिलने के आसार हैं। केंद्र सरकार ने ट्रेड मार्जिन की लिमिट तय करने का विचार किया है। केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स मिनिस्ट्री के फार्मास्युटिकल्स डिपार्टमेंट ने मेडिकल डिवाइस एसोसिएशंस, हेल्थकेयर इंडस्ट्री के संगठनों और अन्य संबंधित रेगुलेटरी इकाइयों से कहा है कि वे इन उपकरणों को कई श्रेणियों में बांटने में उसकी मदद करें। इस संबंध में विभाग के सेक्रेटरी की अध्यक्षता में 25 अक्टूबर को एक वर्कशॉप लगाई जाएगी ताकि ट्रेड मार्जिन फिक्स करने पर विचार किया जा सके। बताया गया है कि मेडिकल डिवाइस सेक्टर में ट्रेड मार्जिंस को तर्कसंगत बनाने के मुद्दे पर विचार किया जा रहा है। इस संबंध में फार्मा सेक्रेटरी की अध्यक्षता में एक बैठक इस साल 16 अक्टूबर को हुई थी, जिसमें सभी संबंधित पक्षों के साथ इस विषय पर चर्चा की गई थी और यह तय किया गया था कि ट्रेड मार्जिंस तय करने के मकसद से मेडिकल उपकरणों को विभिन्न श्रेणियों में बांटने पर निर्णय करने की खातिर एक वर्कशॉप का आयोजन किया जाए। लेटर के मुताबिक जिन 23 मेडिकल उपकरणों को ‘ड्रग्स’ के रूप में नोटिफाई किया गया है, उनके मामले में इंडस्ट्री से जुटाए गए एक्स-फैक्ट्री प्राइसेज यानी प्राइस टु ट्रेड के आंकड़ों को नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी सामने रखेगी। इसके अलावा इंडस्ट्री इन मेडिकल डिवाइसेज के विभिन्न सेगमेंट्स पर निर्णय करने के संबंध में डेटा पेश करेगी। इन 23 में से लगभग 19 डिवाइसेज अभी प्राइस कंट्रोल सिस्टम में नहीं हैं। इनमें सर्जिकल्स से लेकर सिरिंज, हार्ट वॉल्व आदि शामिल हैं। ऑर्थोपीडिक इंप्लांट्स की कैटेगरी में भी केवल नी इंप्लांट्स को ही प्राइस कंट्रोल में लाया गया है। कीमतों की लिमिट तय करने के मामले में प्रॉडक्ट की मैक्सिम प्राइस की सीमा निर्धारित की जाती है। वहीं ट्रेड मार्जिन तय करने में यह हदबंदी होगी कि किसी प्रॉडक्ट की इंपोर्ट या मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट से ऊपर किस हद तक उसका दाम बढ़ाया जा सकता है। एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइसेज इंडस्ट्री के फोरम कोऑर्डिनेटर राजीव नाथ ने कहा है कि फार्मास्युटिकल्स इंडस्ट्री में ट्रेड मार्जिन तय करने की संभवत: जरूरत नहीं है, लेकिन मेडिकल डिवाइसेज के मामले में कस्टमर के पास चॉइस नहीं होती और सबसे सस्ते और बेहतरीन प्रॉडक्ट तक उसका एक्सेस नहीं है।