नई दिल्ली। फार्मा सेक्टर को बूस्ट मिल रहा है। इसके बावजूद जेनरिक दवाएं अभी भी महंगी हैं। इनोवेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े निवेश का प्लान तैयार किया है। इसका मकसद भारत की ग्लोबल पोजीशन को और बेहतर बनाना है। सरकार सस्ती जेनरिक दवाओं से खर्च घटाने का सपना देख रही है। वहीं ये दवाएं आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं।

भारत का जेनरिक ड्रग मार्केट 2034 तक $53.5 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। लोगों का हेल्थकेयर पर होने वाला खर्च अब भी काफी ज्यादा है। सरकार ने बायोफार्मा शक्ति इनिशिएटिव के तहत पांच सालों में 10,000 करोड़ का फंड आवंटित किया है। इसे बाजार में मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है। हालांकि बजट घोषणाओं के बाद में कुछ तेजी देखी गई। यह सरकार के कमिटमेंट पर निवेशकों का भरोसा दिखाती है। इस स्ट्रैटेजिक पुश का लक्ष्य भारत को बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स का ग्लोबल हब बनाना है। इसमें फोकस हाई-वॉल्यूम वाले पारंपरिक जेनरिक से हटकर है।

हालांकि सेक्टर में अस्थिरता देखी गई है। कुछ बड़े जेनरिक प्लेयर्स को बिक्री में नुकसान और प्राइसिंग प्रेशर का सामना करना पड़ रहा है। यह बताता है कि आर्थिक हालात और दवाओं के लाइफसाइकल पॉलिसी के ऑप्टिमिज्म को कम कर सकते हैं। भारत का फार्मा एक्सपोर्ट काफी बड़ा है। इसमें जेनरिक दवाओं का रेवेन्यू इंडस्ट्री का करीब 70 फीसदी है। ये खासकर यूरोप जैसे रेगुलेटेड मार्केट की बड़ी डिमांड पूरी करती है। भारत के डोमेस्टिक मार्केट में कुछ अंदरूनी समस्याएं हैं।

जनऔषधि परियोजना का लक्ष्य क्वालिटी वाली जेनरिक दवाएं कम दाम पर उपलब्ध कराना है। इससे सालाना करीब 5,000 करोड़ की बचत होने का अनुमान है। लेकिन, इसकी पहुंच सीमित है। कुछ प्रमुख समस्याएं हैं। जनऔषधि केंद्रों की कमी, दवाओं की सीमित वैरायटी आदि। इससे भी बड़ी बात यह है कि मार्केट में ब्रांडेड जेनरिक का दबदबा है।