नई दिल्ली। दवा की एमआरपी और रिटेलर की खरीद कीमत में भारी अंतर है। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से लूट और डकैती करार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि दवाओं की एमआरपी और पीटीआर के बीच भारी अंतर को काबू करने में सरकार विफल रही है। एससी ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि ‘क्या आप इस लूट को सही ठहरा सकते हैं?’
पीठ ने कैंसर की दवाओं पर 1000 फीसदी तक मार्जिन लगाने के लिए निजी अस्पतालों व सरकार को फटकार लगाई। पीठ ने मौजूदा मूल्य निर्धारण व्यवस्था की कड़ी आलोचना की। अस्पतालों द्वारा वसूले जा रहे अत्यधिक मार्जिन को ‘लूट’ और ‘डकैती’ करार दिया। यह उन मरीजों को निशाना बनाता है, जिनके पास मोलभाव करने की ताकत नहीं होती।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जरनल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार मूल्य निर्धारण नीतियों में सुधार कर रही है। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा ‘आपका यह सुधार बहुत ही बेतुका है। 11,000 रुपये की कीमत 1,30,000 रुपये तक पहुंच जाना कोई सुधार नहीं है। जब बात मरीजों और उनकी जान की हो, तो क्या हमें ऐसी पूंजीवादी सोच रखनी चाहिए?’
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के मूल्य निर्धारण से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ‘ऐसा लगाता है कि पूरा तंत्र दवा बनाने वाली फर्मा कंपनियों के पक्ष में खड़ा है। पीठ ने कहा कि ‘राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुकी है।




