माफी का खाना नहीं तो यहां ‘मजबूर’ क्यों स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज

चंडीगढ़/रोहतक: ‘मेरे यहां माफी का खाना ही नहीं है, मुझे सरकार का काम ठप नहीं होने देना, सस्पेंड करो इसे’- यह कहते हुए बीती 12 अप्रैल को स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने चंडीगढ़ सचिवालय में औचक निरीक्षण कर कई कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया। अपने इन्हीं तेवरों से सरकार और प्रशासन के बीच छाए रहने वाले अनिल विज प्रदेश के एकमात्र चिकित्सा संस्थान पीजीआई, रोहतक में घोटाले-गड़बड़झाले, डॉक्टर की पसंद के केमिस्ट से सस्ती दवाओं का महंगा दाम चुकाने को मजबूर मरीजों का हाल क्यों नहीं देख पा रहे। शायद ही किसी दिन कोई ऐसा अखबार हो, जिसमें पीजीआई में मरीजों की दुर्दशा से जुड़ा किस्सा न छपा हो, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री जब भी यहां आते हैं, तारीफ के ऐसे पुल बांध जाते हैं, जिस पर चलते हुए यहां के कई डॉक्टर मरीजों के हित कुचल कर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
हालत यह है कि मरीज डॉक्टर की पसंद के दवा दुकानदार से ऑपरेशन का सामान या दवा न खरीदे तो मजबूर सहायकों को डॉक्टर का ‘क्रोध’ झेलना पड़ता है। सेटिंग इतनी तगड़ी है कि ऑपरेशन थिएटर के इर्द-गिर्द ही केमिस्ट शॉप का प्रतिनिधि डॉक्टर की पर्ची लेकर मनमर्जी का सामान पहुुंचाने को तैयार खड़ा रहता है। मरीज और उसके सहायक को तो सिर्फ मोट बिल की पर्ची थमा दी जाती है। जब तक बिल नहीं चुकाया जाता, मरीज को छुट्टी नहीं मिलती। सप्ताह भर पहले ही पीजीआई के वार्ड 12 में ऐसे कई मरीजों का दर्द सामने आया। इलाज की मजबूरी में सिवाय बेबस होकर लुटने के और कोई चारा नहीं दिखा। दूसरी तरफ, जो डॉक्टर अच्छा काम करना चाहते हैं, लूट-बाजारी के खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें प्रबंधन के ऊंचे ओहदे पर बैठे अफसर षड्यंत्र रचकर फालतू के पचड़ों में उलझा देते हैं। डॉक्टर और प्रबंधन की आपसी खींचतान में मरीज पिसता रहता है।
स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारियों की लापरवाही देखकर गुस्से से ‘तिलमिलाने’ वाले स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज बड़े अफसरों और पीजीआई के डॉक्टरों के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रहे, समझ से परे हैं। या यूं कहें कि  बड़े अधिकारी, डॉक्टर और  इस बड़े चिकित्सा संस्थान की आड़ में लालचपूर्ति करने वाले लोग उन्हें अपने दायरे से बाहर झांकने ही नहीं  देते! कुछ महीने पहले एक जवान लडक़े को पीजीआई के डॉक्टरों ने अपाहिज बनाकर बैसाखी पकड़ा दी। बेचारा चक्कर काट-काटकर थक गया, लेकिन लापरवाह डॉक्टरों का कुछ नहीं बिगड़ा। स्वास्थ्य मंत्री यदि इच्छाशक्ति के साथ पीजीआई की ग्राउंड रिपोर्ट देखें तो माथा पकड़ लेंगे। लोगों की मानें तो लापरवाही और गड़बड़ घोटालों के ढेरों सबूत होने के बावजूद स्वास्थ्यमंत्री तक इसलिए नहीं पहुंचाते, क्योंकि ढाई साल में एक्शन कम और हंगामा ज्यादा। पीजीआई में भी कई ईमानदार कर्मचारी और डॉक्टरों के पास गड़बडिय़ों की लंबी फेहरिश्त सबूतों के साथ मौजूद है, लेकिन सामने इसलिए नहीं आते कि दोषियों का कुछ बिगडऩा नहीं और उनकी जान पर बन आएगी।
कुलमिलाकर  मरीज जब सफेद चोगे वाले ‘भगवान’ के लालची मोहपाश में फंसता है तो वह ऊपर बैठे सफेद कुर्ते वाले नेता से अपेक्षा रखने की बजाए ऊपरवाले भगवान से ही मदद की उम्मीद रखता है, क्योंकि धरती पर इन दोनों का गठजोड़ इतना मजबूत है, जिसकी गांठ खोलना आम आदमी के वश में तो शायद नहीं है।
       मुफ्त दवा या मुनाफा !
         सरकार के सख्त आदेश हैं कि पीजीआई में मरीजों को दवाएं मुफ्त मिलेंगी। पीजीआई के लिए कागजों में करोड़ों रुपये की दवाएं और अन्य जरूरी सामान खरीदा भी जा रहा है, फिर भी पीजीआई के बाहर केमिस्टों के काउंटर पर ही दिनों-दिन भीड़ बढ़ती जा रही है। डॉक्टर, पीजीआई औषधालय की पर्ची बनाकर दवा लिख भी देते हैं, लेकिन मरीज को बामुश्किल एक-दो सस्ते दामों वाली दवा ही मिल पाती हैं, बाकी महंगी दवाएं बाहर से ही खरीदकर खानी पड़ती है। आठ-दस दवा लिखी डॉक्टर की मुफ्त वाली पर्ची को पीजीआई का औषाधालय मरीज को एक-दो दवा देकर अपने पास रख लेता है। मरीज जब विरोध करता है कि दवा एक दी है और पर्ची पूरी रख ली, तो रिकॉर्ड में रखने की बात कहकर चलता कर दिया जाता है। यानी सरकार के सामने पीजीआई प्रबंधन मरीज को सभी दवा दिए जाने का रिकॉर्ड का प्रस्तुत कर वाहवाही लूट लेता है। सूत्रों की मानें तो दवा खरीद में भारी घोलमाल  है। ई-टेंडर में उसी फर्म का नाम खुलता है, जो कमेटी के कुछ लोगों से पहले ही ‘खुल’ जाते हैं।
धार्मिक फिल्म हरि दर्शन का भजन-‘मारने वाला है भगवान, बचाने वाला है भगवान’… यहां फिट बैठता है।

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