नई दिल्ली: हेल्थ ऐप, एआई आधारित जांच सॉफ्टवेयर और डिजिटल इलाज के बढ़ते इस्तेमाल के बीच भारत ने इनके लिए स्पष्ट नियम तय कर दिए हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने मेडिकल डिवाइस नियम (एमडीआर) 2017 के तहत ‘मेडिकल डिवाइस सॉफ्टवेयर’ (एमडीएसडब्ल्यू) पर अंतिम गाइडेंस दस्तावेज 21 जुलाई 2026 को जारी किया है। यह गाइडेंस अक्टूबर 2025 में जारी मसौदे पर मिले सुझावों के बाद तैयार किया गया है।

किस सॉफ्टवेयर पर लागू होंगे नियम

सीडीएससीओ के अनुसार, कोई भी सॉफ्टवेयर जो किसी चिकित्सीय उद्देश्य के लिए बनाया गया है, मेडिकल डिवाइस सॉफ्टवेयर माना जा सकता है। इसके दायरे में ये शामिल हैं:

  • सॉफ्टवेयर एज ए मेडिकल डिवाइस (एसएएमडी): ऐसा सॉफ्टवेयर जो खुद में एक मेडिकल डिवाइस है, जैसे बीमारी पहचानने वाला ऐप।
  • सॉफ्टवेयर इन ए मेडिकल डिवाइस (एसआईएमडी): किसी मशीन के अंदर लगा सॉफ्टवेयर।
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित मेडिकल सॉफ्टवेयर
  • इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) से जुड़े उपकरण और डिजिटल थेरेप्यूटिक्स
  • चिकित्सीय उपयोग वाले कुछ मोबाइल ऐप

किसी सॉफ्टवेयर पर ये नियम लागू होंगे या नहीं, यह मुख्य रूप से उसके ‘इच्छित उपयोग’ (इंटेंडेड यूज) से तय होगा।

लाइसेंस के अलग-अलग रास्ते

गाइडेंस में मेडिकल डिवाइस और इन-विट्रो डायग्नोस्टिक (आईवीडी) सॉफ्टवेयर के लिए अलग-अलग नियामक रास्ते तय किए गए हैं। इनमें परीक्षण लाइसेंस, क्लिनिकल जांच, भारत में बिक्री के लिए मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस और आयात लाइसेंस से जुड़ी आवश्यकताएं शामिल हैं। जोखिम के आधार पर सॉफ्टवेयर का वर्गीकरण भी किया जाएगा।

साइबर सुरक्षा पर खास जोर

नए गाइडेंस में मरीजों के डेटा और उपकरणों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसमें साइबर सुरक्षा, सॉफ्टवेयर बिल ऑफ मटीरियल्स (एसबीओएम), लगातार प्रदर्शन निगरानी और भारत के डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र के साथ सुरक्षित तालमेल (इंटरऑपरेबिलिटी) को अहम बताया गया है। इसके अलावा गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली, तकनीकी दस्तावेज और लेबलिंग की जरूरतें भी तय की गई हैं।

डीसीजीआई की सलाह

भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) ने सभी हितधारकों को सलाह दी है कि मेडिकल डिवाइस नियम 2017 के तहत नियामक मंजूरी के लिए आवेदन करते समय इस अंतिम गाइडेंस का पालन करें।

हेल्थ-टेक कंपनियों और मरीजों पर असर

विशेषज्ञों के अनुसार, इस गाइडेंस से भारत के नियम दुनिया के प्रमुख बाजारों के अनुरूप हो गए हैं। हेल्थ-टेक स्टार्टअप्स और सॉफ्टवेयर कंपनियों को अब यह साफ पता होगा कि उन्हें किन नियमों का पालन करना है, जिससे मंजूरी की प्रक्रिया आसान और तेज हो सकती है।

मरीजों के लिए इसका मतलब है कि बीमारी की जांच या इलाज में इस्तेमाल होने वाले ऐप और एआई टूल अब नियामक जांच के दायरे में होंगे। इससे गलत नतीजे देने वाले या असुरक्षित सॉफ्टवेयर पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। तेजी से बढ़ते डिजिटल हेल्थ बाजार में यह कदम भरोसा और सुरक्षा दोनों बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

स्रोत: सीडीएससीओ सार्वजनिक सूचनाएं; एमर्गो बाय यूएल