नई दिल्ली। क्लिनिकल ट्रायल बिना दवा बिक्री पर एससी ने केंद्र और डीसीजीआई को फटकारा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और DCGI को कड़ी फटकार लगाई। यह फटकार उन दवा कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई न करने के लिए लगाई गई। जोकि कथित तौर पर लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी का निर्माण और बिक्री कर रही थीं।
ये कंपनियां कोविड-19 महामारी के दौरान मिली आपातकालीन मंजूरियों के आधार पर ऐसा कर रही थीं। इनकी समय-सीमा पहले ही खत्म हो चुकी थी। कोर्ट ने पूछा कि पिछले पांच सालों से रेगुलेटरी अधिकारी क्या कर रहे थे। जबकि यह दवा बिना किसी क्लिनिकल ट्रायल के बेची जा रही थी। जब ये दवाएं बिना जरूरी नियमों के बेची जा रही थीं। तब आपके अधिकारी पांच साल तक क्या कर रहे थे? क्या वे सो रहे थे या फिर उनकी जेबें गर्म की गई थीं?
बेंच ने उन कंपनियों के खिलाफ रेगुलेटरी कार्रवाई शुरू करने में हुई देरी पर नाराजगी जताई। जिन पर महामारी के दौर की अस्थायी अनुमतियों के सहारे काम जारी रखने का आरोप है। कोर्ट के दखल के बाद ही सरकार ने इन कंपनियों के खिलाफ कदम उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की, आप फरवरी 2026 में जाकर जागे। जब कोर्ट ने आपको टोका, तब आपने नोटिस जारी करना शुरू किया।
जनहित याचिका की सुनवाई :
यह फटकार राजेंद्र प्रसाद द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान लगाई गई। इस याचिका में लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी का निर्माण-बिक्री जारी रखने पर सवाल उठाए गए हैं। इसे 2021 में कोविड-19 के दौरान आपातकालीन अनुमति के तहत छूट दी गई थी। उस समय मरीजों में म्यूकोरमाइकोसिस के इलाज के लिए इस दवा की ज्यादा जरूरत थी। यह एक जानलेवा संक्रमण हो सकता है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि कई दवा कंपनियों को आपातकालीन मंजूरी दे दी गई थी। लेकिन ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की ओर से इस पर कोई प्रभावी फॉलो-अप नहीं किया गया। सन फार्मा की के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि उनकी कंपनी को कोई आपातकालीन मंजूरी नहीं दी गई थी। पीठ ने कहा कि हमारे निर्देश उन सभी कंपनियों पर लागू होंगे, जिन्हें कोविड के दौरान उचित परीक्षण के बिना आपातकालीन लाइसेंस दिए गए थे।





