नैनीताल (उत्तराखंड)। आयुर्वेदिक फार्मासिस्ट की पुनर्नियुक्ति पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आया है। उच्च न्यायालय ने आयुर्वेदिक फार्मासिस्टों की वरिष्ठता विवाद को लेकर दायर याचिकाओं पर निर्णय सुनाया है। खंडपीठ ने उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण के आदेश को सही ठहराया है। इसमें विभाग द्वारा जारी 2019 की अंतिम वरिष्ठता सूची को रद्द कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि फार्मासिस्टों की वरिष्ठता का निर्धारण 7 नवंबर 2012 को जारी हुए नियुक्ति आदेश पर ही किया जाएगा।
यह मामला 2009 में आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवा निदेशक द्वारा निकाली गई भर्ती से जुड़ा है। उस समय चयन समिति ने बैक-पेपर या पूरक परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों को अलग श्रेणी में रखा था। उन्हें योग्यता सूची में नीचे कर दिया था। इसके खिलाफ प्रभावित उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 2012 में एकलपीठ ने पुरानी चयन सूची को निरस्त कर नई सूची तैयार करने के आदेश दिए। बाद में विशेष अपील में भी इस फैसले को बरकरार रखा था। शासन ने फिर 2012 में नए सिरे से नियुक्तियां दीं। विभाग ने 2019 में जारी वरिष्ठता सूची में 2009 के बैच के कर्मचारियों को वरिष्ठता का लाभ दे दिया। इसे ट्रिब्यूनल ने रद्द कर दिया था।
पुरानी वरिष्ठता का दावा कर रहे अभ्यर्थियों ने ट्रिब्यूनल के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि वे 2009 से बिना किसी सेवा व्यवधान के लगातार काम कर रहे हैं। उन्हें वेतन संरक्षण का लाभ भी मिला है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन तर्कों को खारिज कर दिया। कहा कि चूंकि 2009 की चयन प्रक्रिया पूरी तरह रद्द हो चुकी थी। किसी भी पक्ष ने बैक-डेटेड नियुक्ति का कोई कानूनी आदेश प्राप्त नहीं किया था। इसलिए 7 नवंबर 2012 को जारी नया आदेश ही वास्तविक मौलिक नियुक्ति माना जाएगा। अदालत ने ट्रिब्यूनल के आदेश को विधि सम्मत माना है। सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं गई हैं।










