जयपुर (राजस्थान)। लैब क्लीयरेंस के बिना सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दवाएं नहीं दी जाएंगी। कोटा और बीकानेर में सिजेरियन के बाद प्रसूताओं की मौत के गंभीर मामलों के बाद यह निर्णय लिया गया। राजस्थान के चिकित्सा विभाग ने बिना टेस्टिंग वाली दवाओं के इस्तेमाल पर सख्त कदम उठाया है। सभी सरकारी चिकित्सा संस्थानों द्वारा स्थानीय स्तर पर खरीदी जाने वाली दवाओं के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। यह रोक तब तक रहेगी, जब तक उन्हें लैबोरेट्री से ‘क्लीयरेंस’ नहीं मिल जाता।
क्वारंटाइन होंगी दवाएं
स्थानीय स्तर पर खरीदी गई दवाओं की हर नई खेप को क्वारंटाइन किया जाएगा। इन दवाओं को जांच होने तक अलग सुरक्षित रखा जाएगा। इन दवाओं के रैंडम सैंपल तुरंत राजकीय प्रयोगशाला में फास्ट-ट्रैक टेस्टिंग के लिए भेजे जाएंगे।
इस पूरी टेस्टिंग प्रक्रिया के लिए वेंडर को किए जाने वाले भुगतान राशि का 1 फीसदी हिस्सा आवंटित किया जाएगा। सरकार ने इस बार जवाबदेही भी तय कर दी है। यदि टेस्टिंग के दौरान कोई भी दवा अमानक मिली तो वेंडर का भुगतान रोक दिया जाएगा। राजस्थान लोक उपापन में उस वेंडर को ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है।
अब स्टेट ड्रग कंट्रोलर हर महीने सरकारी अस्पतालों का औचक निरीक्षण करेंगे। वे स्थानीय स्तर पर खरीदी गई दवाओं के स्टॉक और रखरखाव को जांचेंगे। टेस्टिंग के लिए खुद रेगुलेटरी सैंपल भी कलेक्ट करेंगे।










