चंडीगढ़। हरियाणा फार्मेसी काउंसिल सवालों के घेरे में आ गई है। 72 हजार 929 पंजीकृत फार्मासिस्टों वाली इस काउंसिल का विवादों से पुराना नाता है। दवा पेशेवरों के पंजीकरण और आचरण पर निगरानी की जिम्मेदारी हरियाणा स्टेट फार्मेसी काउंसिल की है। काउंसिल के कामकाज, पंजीकरण और उसके पदाधिकारियों से जुड़े मामले समय-समय पर अदालतों तक पहुंचे हैं। सबसे बड़ा सवाल काउंसिल की नियामक क्षमता और पंजीकरण व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर है।
हरियाणा फार्मेसी काउंसिल का गठन एक मई 1971 को हुआ था। राज्य काउंसिल का काम फार्मासिस्टों का रजिस्टर तैयार करना, उसका रखरखाव करना था। साथ ही कानून के मुताबिक पेशेवर गतिविधियों को नियंत्रित करना है। काउंसिल के पास पेशेवर कदाचार के मामलों में कार्रवाई करने की शक्तियां भी हैं। उसके फैसले सीधे मरीज की सुरक्षा से जुड़े हैं। फार्मासिस्ट डॉक्टर की ओर से लिखी दवा उपलब्ध कराने, उसके सही इस्तेमाल में अहम भूमिका निभाते हैं। गलत व्यक्ति का पंजीकरण पूरी व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। हरियाणा फार्मेसी काउंसिल के साथ बरसों से ऐसा होता आ रहा है।
अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज कई विवाद
काउंसिल का सबसे गंभीर पहलू शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन रहा है। एक मामले में काउंसिल की जांच के दौरान फार्मेसी डिप्लोमा से जुड़े प्रमाणपत्र पर सवाल सामने आया था। सत्यापन में यह जानकारी मिली कि उस अवधि में वहां फार्मेसी पाठ्यक्रम संचालित नहीं हुआ था। मामला हाई कोर्ट पहुंचा और अदालत के रिकॉर्ड में प्रमाणपत्र को फर्जी बताया गया। यह मामला दिखाता है कि पंजीकरण से पहले शैक्षणिक योग्यता की जांच कितनी महत्वपूर्ण है।










