विदेशी तर्ज पर बने एंटीबायोटिक दवा की नीति

जयपुर। भारत में छोटी बीमारी में भी डॉक्टर मरीज को विदेश की तर्ज पर भारत में भी एंटीबायोटिक दवा देने की नीति लागू होनी चाहिए। यह राय डॉ. ऋषभ जैन ने ऑटोराइड 2017 की राष्ट्रीय कांफ्रेंस में रखी। उन्होंने बताया कि हमारे देश में आम बीमारी में भी रोगी को एंटीबायोटिक दे दी जाती है। स्थिति यह हो गई है कि एंटीबायोटिक काम ही नहीं करती। ईएनटी की बीमारियों में यह स्थिति ’यादा खराब हो रही है। डा. जैन ने बताया कि कान की बीमारियों के इलाज में एन्डोस्कोपी (दूरबीन) तकनीक काम रही है।
अब कान के पीछे चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे इन्फेक्शन का खतरा भी नहीं रहा है। एन्डोस्कोपी में कान के अंदर का &60 डिग्री का व्यू जाता है, जिससे अंदर चारों तरफ देख कर इलाज किया जा सकता है। पद्मश्री डॉ. मोहन कामेश्वरन ने कहा कि आज कम उम्र से ही ब‘चे मोबाइल फोन का उपयोग कर रहे हैं और कान में फोन को लगाए रखना या ब्लूटूथ का उपयोग करने से कान में सूनापन, सांय-सांय की आवाज आने लगती है। मोबाइल से निकलने वाली तरंगें कान के परदे को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इससे बचने को ईयरफोन लगाना चाहिए।